मधुमेह और मिथक :मधुमेह जीवन की समाप्ति नहीं है — यह जीवनशैली में अनुशासन की शुरुआत है।
मधुमेह और मिथक
आज के युग में मधुमेह, जिसे हम डायबिटीज़ के नाम से जानते हैं, न केवल एक शारीरिक रोग बन चुका है, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी चुनौती पेश करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मधुमेह तेजी से बढ़ती हुई गैर-संक्रामक बीमारियों में से एक है। भारत को तो “डायबिटीज़ की राजधानी” तक कहा जाने लगा है। परंतु जितनी तेजी से यह रोग फैल रहा है, उससे कहीं अधिक तेजी से इससे जुड़े मिथक और भ्रांतियाँ समाज में व्याप्त हो रही हैं।
आज हम कुछ प्रमुख मिथकों के बारे में बात करेंगे
मिथक 1: “मधुमेह मिठाई खाने से होता है”
यह सबसे आम लेकिन गलत धारणा है। वास्तविकता यह है कि मधुमेह तब होता है जब शरीर में इंसुलिन नामक हार्मोन का निर्माण कम हो जाता है या शरीर उस पर ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करता। मिठाई या चीनी का अत्यधिक सेवन निश्चित रूप से सभी के लिए हानिकारक है और मधुमेह के लिए एक रिस्क फैक्टर हो सकता है, लेकिन येअकेला कारण नहीं है। मोटापा, अनुवांशिक प्रवृत्ति, निष्क्रिय जीवनशैली और तनाव भी प्रमुख कारण हैं।
मिथक 2: “एक बार मधुमेह हो गया तो जीवनभर दवा खानी ही पड़ेगी”
यह बात पूर्णतः सही नहीं है। मधुमेह के बहुत से कारण होते है
और कई बार उन कारणों के ठीक होने से मधुमेह ठीक हो जाता है।
जैसे अगर किसी को गर्भावस्था में शुगर हुआ है तो जरूरी नहीं कि प्रसव के बाद भी उनको शुगर रहे। इसके अलावा टाइप 2 डायबिटीज़ के शुरुआती चरणों में यदि व्यक्ति अपने आहार में बदलाव करता है, नियमित व्यायाम करता है और वजन नियंत्रित रखता है, तो कई बार दवाओं की आवश्यकता भी समाप्त हो सकती है। हालांकि कुछ रोगियों को जीवनभर दवा या इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन यह रोगी की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके अलावा कई ऐसी दवाइयां आ चुकी है, जो मधुमेह को रिवर्स करने में मदद करते है। यह तक कि इंसुलिन भी जरूरी नहीं कि जीवन भर चले, कई मरीजों में ये समय के साथ बंद हो जाता है ।
मिथक 3: “इंसुलिन लेना आदत बना देता है”
कुछ लोग इंसुलिन को अंतिम विकल्प मानते हैं और इससे डरते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इंसुलिन शरीर का एक प्राकृतिक हार्मोन है, जिसे जब शरीर स्वयं नहीं बना पाता, तब बाहर से दिया जाता है। यह कोई नशा नहीं, बल्कि जीवनरक्षक उपाय है, विशेषतः टाइप 1 डायबिटीज़ में। इसके अलावा गर्भावस्था में और बड़ी शल्य चिकित्सा के दौरान इंसुलिन जरूरी होता है , जो बाद में बंद हो जाता है। यहां तक कि कई मरीजों में टाइप 2 डायबिटीज में भी इंसुलिन बंद हो जाता है। अगर आपको आवश्यकता है तो आपको इंसुलिन लेना चाहिए।
मिथक 4: “घरेलू नुस्खों और आयुर्वेद से मधुमेह पूरी तरह ठीक हो सकता है”
यह एक खतरनाक भ्रम है। कई बार लोग बिना चिकित्सा परामर्श के एलोपैथिक दवाइयाँ छोड़कर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर हो जाते हैं, जिससे जटिलताएँ बढ़ जाती हैं। आयुर्वेद और घरेलू उपाय सहायक हो सकते हैं, लेकिन इनका उपयोग डॉक्टर की देखरेख में ही करना चाहिए। मधुमेह एक आधुनिक बीमारी है, इसकी जांच भी आधुनिक ही है। पुराने समय में मधुमेह की जांच ही उपलब्ध नहीं थी तो उसका इलाज होना भी संभव नहीं है। यहा तक कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में ड्रग एंड मैजिक रेमेडी एक्ट के तहत शुगर का जड़ से इलाज करने का दावा करना एक कानूनन अपराध है।
समाधान – ज्ञान और जागरूकता
मधुमेह एक ‘लाइफस्टाइल डिसऑर्डर’ है, जिसका नियंत्रण व्यक्ति स्वयं कर सकता है — सही खानपान, नियमित व्यायाम, तनाव प्रबंधन और समय-समय पर ब्लड शुगर की जाँच इसके मूल स्तंभ हैं। समाज में फैले मिथकों को दूर करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कि रोग का उपचार। स्वस्थ जीवन शैली किसी भी व्यक्ति के लिए आवश्यक भी है और लाभप्रद भी, चाहे उसे कोई बीमारी हो या न हो
पर बीमारी होने के बाद उसका सही उपचार भी आवश्यक है।
आज आवश्यकता है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ, मिथकों को तोड़ें और मधुमेह को समझदारी से नियंत्रित करें। याद रखिए, मधुमेह जीवन की समाप्ति नहीं है — यह जीवनशैली में अनुशासन की शुरुआत है।
स्वस्थ रहे, मस्त रहे
डॉ अनिमेष चौधरी
MD मेडिसिन एवं मधुमेह रोग विशेषज्ञ
