May 4, 2026

वर्ग चेतना को जगाने का यत्न करती ‘अमूर्त काल’ : बलराम अग्रवाल

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अजय रोहिल्ला को मैं 1983 के आसपास से लगातार देख रहा हैं। उसकी कामयाबियों से बहुत लोग परिचित हैं लेकिन मैं उसके कुछेक भयावह संघर्षों से भी मैं परिचित हूँ। मार्क्स ने कहा था-‘राजनीति, विज्ञान, कला, धर्म और इस प्रकार की बातों में रुचि लेने से पहले मानव को खाना पीना, वस्त्र और आवास मिलना चाहिए।’ भारतीय दर्शन इस सत्य को ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनं’ यानी मानव से जितने भी धर्मों के पालन की अपेक्षा धार्मिक और राजनीतिक समाज करता है, उन सबको साधने के लिए मनुष्य के पास स्वस्थ शरीर का होना आवश्यक है। अजय ने इस सत्य को किताबों में पड़कर नहीं, स्वयं झेलकर जाना है। संग्रह की भूमिका सरीखे अपने मनोभावों में रोविन दा ने लिखा है- ‘उन दिनों (यानी 1985 के आसपास) मैं एन एस डी में एक प्रताड़ित शिक्षक था, इसलिए तुम्हारे जैसे धूमकेतु की तरह में भी अपना रास्ता ढूँढता रहता था। मैं खुश हुआ कि मंडी हाउस के इलाके में एक और अशांत ग्रह दिखने लगा है।… लेकिन बहुत जल्द ही तुमने अपनी बहु-आयामी प्रतिभा का परिचय दिया। ‘फूलनदेवी’ फिल्म में एक किरदार के रूप में दिखे, फिर नाट्य ग्रुप बनाकर उसमें प्ले डायरेक्ट करते हुए मल्टी टास्किंग करते रहे… और शायद उन्हीं दिनों तुम्हें रंगों से खेलने की बीमारी भी लग गयी… खैर, फिर तुम कभी हम लोगों के हाथ नहीं आये।’ रॉबिन दा का यही कथन मेरी भी कलम से यों निकला-‘कुल मिलाकर यह कि अजय रोहिल्ला फक्कड़ किस्म के बहुमुखी प्रतिभा बाले आदमी हैं। ‘फक्कड़’ इस अर्थ में कि किसी एक विधा से वे कभी भी बँधे नहीं हैं। अनेक साहित्यिक रचनाओं को उन्होंने स्वर भी दिया है।’

अजय के कविता संग्रह ‘अमूर्त काल’ की अधिकतर कविताओं का स्वर धर्म और दर्शन की जड़ मान्यताओं पर प्रहार करता है, सीधे-सपाट नहीं, प्रतीकों और बिम्बों की भाषा में। इस समीक्षा में उनकी मात्र 3 ही कविताओं की व्याख्या है। ये कविताएँ खास तौर पर नहीं चुनी जाकर ऐसे चुनी गयी हैं जैसे चावलों का पक जाना जानने के लिए रसोइए द्वारा हाँडी में से कोई भी कुछेक चावल उठाकर चुटकी से रगड़ दिये जाते हैं।

‘अमूर्त काल’ की कविता ‘खामोश खतरा’ एक तीव्र सामाजिक-राजनीतिक बिस्फोट है। आधुनिक यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह वर्ग संघर्ष, सत्ता की दमनकारी प्रकृति और वैचारिक शोषण की गहन पड़ताल प्रस्तुत करती है। कविता में रंग-संकेतों का लगभग मौलिक प्रयोग हुआ है। मसलन, लाल (खून, सत्ता), नीला (ठंडा विष, मृत सपने), पीला (झूठा साध्य, सत्ता का मूक समर्थन), और हरा (जहर, भ्रम)। ये सब पूँजीवादी राज्य-संरचना की क्रूरता और आमजन की विवशता को उभारते हैं।

इस कविता में ‘नंगी भक्ति’, ‘टूटी आस्था’, ‘मंदिर तोड़ती मस्जिद चवाती जैसे बिंव धार्मिक वैमनस्य और सांस्कृतिक पूँजीवाद के उस रूप को उजागर करते हैं जो जनमानस को वास्तविक वर्ग-संघर्ष से भटका देता है। शोषित वर्ग को निष्क्रिय, भ्रमित और भयभीत रखने का माध्यम-धर्म-यहाँ ‘अफीम’ की तरह प्रस्तुत है।
इस कविता में ‘लाशें देखती हैं, हँसती हैं’, ‘बेरंग साये’, ‘गिद्ध-से चीरते’, ‘सपनों का बाजार’ जैसे दृश्य समाज की अमानवीयता और वस्तुवादी संस्कृति का प्रतीक हैं। कविता बताती है कि मनुष्य अब एक सामाजिक प्राणी नहीं, बल्कि सत्ता और पूँजी की प्रयोगशाला में बदल दिया गया ‘माल’ है। ‘नीली चुप्पी’, ‘अंधेरा घुप अंधेरा’, और ‘ब्लैक होल’ जैसे दृश्य सत्ता द्वारा उत्पन्न वैचारिक शून्यता को रेखांकित करते हैं जिसमें व्यक्ति का अस्तित्व, प्रतिरोध और चेतना सब निगल लिए जाते हैं।

‘नारंगी क्षितिज खतरे की चेतावनी’ सत्ता के फैलते फासीवाद की घोषणा मात्र नहीं, बल्कि क्रांति से पूर्व की वह अंतिम घंटी भी है, जहाँ शोषित वर्ग के उठ खड़े होने की संभावना निहित है।

कविता ‘मैं सवाल हूँ’ आत्म-जागरूकता, प्रतिरोध और विचारधारा के विरुद्ध खड़े होने वाले जनचेतन प्रश्न की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें ‘सवाल’ केवल बौद्धिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि सत्ता-विरोधी चेतना का रूपक है। ऐसा चेतन रूप जो शोषित वर्ग के भीतर जन्म लेता है और पूँजीवादी सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देता है।

‘मैं सवाल हूँ’ में ‘सभ्यता की भूल मेरा गर्भ और ‘तर्क मेरा दूध / जवाब मेरा आलिंगन’ जैसे वाक्य संकेत करते हैं कि पूँजीवादी इतिहास की शुरुआत से ही ‘सवाल’ यानी विचारशीलता, एक ऐसा तत्व रहा है जिसे या तो दबाया गया या मोड़ा गया। लेकिन यह सवाल हर उत्तर में ‘थोड़ा-सा गुम’ होकर भी ‘नई चुप्पियों में उगता’ है यानी हर वैचारिक दमन के बाद भी चेतना फिर जन्म लेती है। यह वही वर्ग चेतना है जो मिथ्या चेतना को तोड़कर वास्तविक संघर्ष को जन्म देती है। सत्ता मेरे भीतर उगाती है- सिंहासन धूल, ताज शब्दों की राख जैसी पंक्तियों सत्ता के वैभव को अल्पकालिक और छायामात्र बताती हैं. और सवाल को उस स्थायी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो हर वैचारिक ढाँचे को विखंडित कर सकती है।

कविता का ‘सवाल’ वस्तुतः वही दबी हुई आवाज है जो शोषित वर्ग की आत्मा से उठती है. और हर ‘जवाब’ या सत्ता-प्रदत्त समाधान को अस्वीकार कर, एक नवीन वर्गीय दृष्टिकोण की खोज करती है। यह कविता क्रांति से पहले की विचार-चेतना है जो पूँजीवादी चुप्पियों में दरारें डालती है, और इतिहास को पुनः मनुष्य-केंद्रित बनाने की संभावना जगाती है।

कविता ‘डोलची का स्वप्न’ पूँजीवादी सत्ता. भक्ति और प्रचार की त्रयी के माध्यम से जनचेतना के विघटन और वैचारिक मशीनीकरण का तीखा आलोचनात्मक चित्र प्रस्तुत करती है। यह रचना वर्ग-संघर्ष, वैचारिक भ्रम, और सांस्कृतिक उत्पादों के बाजारीकरण की प्रक्रिया को उद्घाटित करती है। कविता का ‘भक्त’ शोषित वर्ग का वह प्रतिनिधि है, लेकिन सत्ता (यहाँ आकाश का प्रतीक) को शोर, तमाशा और प्रचार के माध्यम से पूजनीय बनाकर स्वयं को छद्म सृजनकर्ता मान बैठा है। उसका यह भ्रम कि उसने ‘हवाओं को शोर का झालर टाँगा’ तथा ‘मैंने तो तेरा मेला सजाया’ भी ‘सत्ता अफीम है’ कथन की पुष्टि करते हैं। यहाँ उत्पीड़क सत्ता को जनता स्वयं वैधता प्रदान करती है।
सत्तासीन ‘आकाश’ का तीखा उत्तर, कि- ‘मैं चापलूसी का भिखारी नहीं, कर्म का दर्पण हूँ’ उस पाखंडी भक्ति-प्रपंच को नकारता है जो सच्चे परिवर्तन के स्थान पर भावनात्मक उत्तेजना और अंध भक्ति को बढ़ावा देता है। हम जानते हैं कि धर्म, प्रचार, भाषा जैसी सांस्कृतिक अधिरचना को शासक वर्ग अपने हित में ढाल लेता है। भक्त का ‘झुनझुना’ थामना यानी सतही प्रचार में विश्वास करना, और ‘कर्म का दर्पण’ न देख पाना झूठी चेतना की उस स्थिति को दर्शाता है जो मेहनतकश वर्ग को क्रांति के बजाय भ्रम में डाले रखता है।

अंततः सपनों का कटोरा उलटना, और आकाश से दूरी वर्गीय चेतना के टूटते भ्रम और यथार्थ की ओर लौटने की शुरुआत है। यह कविता प्रतीकात्मक रूप से शोषित वर्ग के आत्म-प्रबोधन की विफलता और सत्ता के प्रचार तंत्र के विरुद्ध संघर्ष की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

वस्तुतः वर्ग चेतना को जगाने का या करती काव्यात्मक चेतावनी का नाम ‘कविता’ है, जिसे इस संग्रह की अधिकतर रचनाएँ सिद्ध करती हैं।

पुस्तक : अमूर्त काल (कविता संग्रह); कवि: अजय रोहिल्ला; प्रकाशक : आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एस सी एफ 267, सेक्टर 16, पंचकूला-134113 (हरियाणा); संस्करण : 2025; आईएसबीएन 978-81-19528-11-0; कुल पृष्ठ 176; मूल्य: रुपये 350/-(पेपरबैक)

समीक्षक : बलराम अग्रवाल, एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उप्र) मोबाइल : 8826499115

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