July 1, 2026

पक्षी पुरुष सलीम अली को नमन प्रकृति के सच्चे प्रहरी और भारत के गौरव को श्रद्धांजलि

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Dr Salim Ali

लेखक: दीपेन्द्र दीवान

भारत की जीवंत प्रकृति में पक्षियों का विशेष स्थान है — वे न केवल सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि पर्यावरण के संतुलन के प्रहरी भी हैं। इन पक्षियों के अध्ययन और संरक्षण को समर्पित एक ऐसा नाम है, जिसे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया श्रद्धा से याद करती है — डॉ. सलीम अली, जिन्हें प्रेमपूर्वक “भारत का पक्षी पुरुष” कहा जाता है। 12 नवम्बर 1896 को मुंबई में जन्मे सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली का बचपन जिज्ञासा और निरीक्षण से भरा था। एक बार उन्होंने एक अज्ञात चिड़िया को घायल पाया। उस छोटी-सी घटना ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। उन्होंने उस पक्षी के बारे में जानने की जिज्ञासा में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) का रुख किया, और यहीं से आरंभ हुआ एक अद्भुत वैज्ञानिक जीवन का सफर। सलीम अली ने जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय से औपचारिक पक्षी-विज्ञान का प्रशिक्षण लिया, लेकिन उन्होंने अपने असली ज्ञान को जंगलों, पहाड़ों और गाँवों की मिट्टी में खोजा। वे कहते थे —“किताबें सिखा सकती हैं, पर प्रकृति समझना सिखाती है।”लद्दाख की ऊँची घाटियों से लेकर केरल के दलदली इलाकों तक, उन्होंने देश के लगभग हर हिस्से में पक्षियों का अध्ययन किया और उनके व्यवहार, प्रवास तथा आवास पर गहन शोध किया। सलीम अली ने भारतीय पक्षियों पर कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें “The Book of Indian Birds” और “Handbook of the Birds of India and Pakistan” आज भी विश्वभर में मानक ग्रंथ मानी जाती हैं। उनकी रचनाओं ने पक्षी-विज्ञान को प्रयोगशालाओं से निकालकर आम जन तक पहुँचाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि विज्ञान केवल प्रयोग नहीं, एक दृष्टिकोण है — प्रकृति को देखने का नया तरीका। सलीम अली केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक प्रकृति योद्धा थे। जब केरल के सायलेंट वैली क्षेत्र में बाँध निर्माण की योजना बनी, तो उन्होंने उसका विरोध किया। यह वही क्षेत्र था जहाँ अनेक दुर्लभ पक्षियों का आवास था। उनके अथक प्रयासों से यह क्षेत्र बच गया और आज सायलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान के रूप में विश्व धरोहर है।इसी तरह उन्होंने राजस्थान के भरतपुर घना पक्षी अभयारण्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यों से यह स्थल आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

सादगी और समर्पण का जीवन सलीम अली का जीवन अत्यंत सादा था। वे कहते थे —“पक्षियों को देखने के लिए दूरबीन से ज्यादा जरूरी है संवेदनशील आँखें।” वे कम साधनों में भी बड़े कार्य करते थे। उनका अनुशासन, मेहनत और ईमानदारी हर शोधकर्ता के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कभी प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति प्रेम के लिए काम किया।उनके कार्यों की सराहना देश और विदेश दोनों में हुई। उन्हें पद्म भूषण (1958) और पद्म विभूषण (1976) जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी। उनके नाम पर सलीम अली बर्ड सैंक्चुअरी (गोवा) और सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री (SACON), कोयंबटूर जैसे संस्थान आज भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों के लिए सलीम अली का मानना था कि —“अगर हम पक्षियों की रक्षा करते हैं, तो हम अपनी प्रकृति की रक्षा करते हैं।”

आज जब पर्यावरण संकट, ग्लोबल वार्मिंग और जैव विविधता के विनाश की चिंता बढ़ रही है, तब सलीम अली के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उनके जीवन से हमें यह सिखना चाहिए कि प्रकृति का संरक्षण कोई वैकल्पिक कार्य नहीं, बल्कि हमारा नैतिक कर्तव्य है।

आज भारत के अनेक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण अध्ययन के कार्यक्रम सलीम अली की प्रेरणा से चल रहे हैं। बर्ड वॉचिंग क्लब्स और इको क्लब्स युवाओं को प्रकृति से जोड़ने का माध्यम बने हैं। उनकी किताबें आज भी यह सिखाती हैं कि विज्ञान और संवेदनशीलता का संगम ही सच्चा ज्ञान है।

डॉ. सलीम अली ने दिखाया कि एक व्यक्ति भी पूरे समाज की सोच बदल सकता है। उन्होंने न केवल पक्षियों को बचाया, बल्कि मनुष्य को यह समझाया कि हर पंख, हर चहचहाहट और हर उड़ान में जीवन की लय छिपी है।आज जब हम सलीम अली को नमन करते हैं, तो यह केवल एक वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक ऐसे दूरदर्शी व्यक्ति को स्मरण है जिसने हमें प्रकृति से संवाद करना सिखाया। आइए, हम सभी प्रण लें —हम अपने आस-पास पेड़ लगाएंगे, जल और आहार से पक्षियों की सहायता करेंगे, और यह सुनिश्चित करेंगे कि आने वाली पीढ़ियाँ भी उस मधुर चहचहाहट को सुन सकें, जिसने कभी एक छोटे बालक सलीम अली को “पक्षी पुरुष” बना दिया था।

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