September 29, 2026

जन्म या गोद, बच्चे में नहीं फर्क: सुप्रीम कोर्ट ने खत्म की 3 महीने की शर्त

0
sc1-1.jpg

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 मार्च) को एक अहम फैसला सुनाते हुए व्यवस्था दी है कि किसी महिला के गर्भ (कोख) से पैदा हुए बच्चे और गोद लिए गए बच्चे में कोई अंतर नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित करना असंवैधानिक है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी महिलाओं को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि मातृत्व संरक्षण का उद्देश्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बच्चा परिवार में कैसे आया है। अदालत ने कहा, “जो महिलाएं बड़े बच्चे को गोद लेती हैं, वे भी उसी स्थिति में हैं जैसे कोई महिला तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं।” पीठ ने कहा, “हालांकि, पारंपरिक रूप से रिश्तेदारी को समझने का मुख्य आधार जीव विज्ञान (बायोलॉजी) रहा है, लेकिन गोद लेना भी परिवार बनाने का उतना ही सही तरीका है। परिवार का आधार जीव विज्ञान नहीं, बल्कि आपसी जुड़ाव और साझा भावनाएँ होती हैं। सिर्फ़ जैविक कारक ही परिवार तय नहीं करते। गोद लिया हुआ बच्चा, अपने सगे बच्चे से किसी भी तरह अलग नहीं होता।”

कानून की धारा पर सवाल
कोर्ट ने माना कि 'सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020' की धारा 60(4) के तहत उम्र से जुड़ी ऐसी पाबंदियाँ, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। इस धारा में यह प्रावधान था कि महिलाएँ मातृत्व अवकाश की हकदार तभी होंगी, जब वे 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लें। हालांकि, अदालत ने इस धारा को निरस्त नहीं किया, बल्कि इसकी व्याख्या करते हुए महिलाओं के अधिकारों का विस्तार किया।

“गोद लेना भी परिवार बनाने का समान अधिकार”
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गोद लेना परिवार बनाने का एक समान और वैध तरीका है। अदालत ने टिप्पणी की, “गोद लिया गया बच्चा तथाकथित ‘जैविक’ बच्चे से अलग नहीं होता। यह मातृत्व और पितृत्व की गहरी स्वीकृति है।” पीठ ने यह भी कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं के चलते तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेना बहुत कम मामलों में संभव होता है, इसलिए यह शर्त व्यावहारिक रूप से भी अनुचित है।

पितृत्व अवकाश पर भी सुझाव
मातृत्व अवकाश के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने की सिफारिश की। कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला हमसानंदिनी नंदूरी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर आया, जिसमें आयु-आधारित इस भेदभाव को मनमाना और असंवैधानिक बताया गया था। यह निर्णय न केवल गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि भारतीय समाज में दत्तक ग्रहण को समान सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *