July 13, 2026

तलाक बिना दूसरे पुरुष संग रहने वाली महिला पत्नी का दर्जा नहीं: हाईकोर्ट

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 प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण पोषण के एक मामले में स्पष्ट किया है कि कोई महिला अपने पहले पति से तलाक लिए बिना और उसके जीवित रहते हुए किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लगती है तो वह कानूनन विवाहित पत्नी का दर्जा नहीं पा सकती। ऐसी स्थिति में वह पुरुष से भरण पोषण प्राप्त करने की हकदार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि माता-पिता के इस रिश्ते से पैदा हुई संतान (चाहे वैध हो या नाजायज) को अपने पिता से भरण पोषण पाने का पूरा कानूनी व नैतिक अधिकार है।

यह आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने दिया है। ​चित्रकूट जिले की महिला और उसकी नाबालिग बेटी ने संतोष कुमार के खिलाफ फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मुकदमा किया था। चित्रकूट के प्रधान पारिवारिक न्यायाधीश ने महिला को दो हजार रुपये और बेटी को एक हजार रुपये प्रति माह भरण पोषण देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ संतोष कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि महिला की शादी करीब 15 साल पहले शारदा प्रसाद से हुई थी, जिससे उसके दो बच्चे भी थे। महिला ने पहले पति से तलाक नहीं लिया और उसके जीवित रहते ही वह संतोष कुमार के साथ रहने लगी। बाद में संतोष के साथ रहते समय ही उसके पहले पति की मृत्यु हुई। महिला फैमिली कोर्ट में यह साबित करने में भी असफल रही कि उसकी शादी संतोष के साथ हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। ​

हाई कोर्ट ने रद्द किया फैमिली कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूतों से यह साफ है कि महिला कानूनी रूप से संतोष की विवाहित पत्नी की परिभाषा में नहीं आती इसलिए फैमिली कोर्ट का महिला के पक्ष में भरण पोषण का आदेश देना पूरी तरह गलत था। साथ ही कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125(4) का हवाला देते हुए महिला को भरण पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। ​कोर्ट ने कहा कि डीएनए रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि संतोष ही उस आठ वर्षीय बच्ची का जैविक पिता है। सीआरपीसी की धारा 125(1)(बी) के तहत पिता का यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह अपनी उस संतान का भरण पोषण करे जो अपना गुजारा करने में असमर्थ है, चाहे वह संतान वैध हो या नाजायज। इसलिए कोर्ट ने बेटी को एक हजार रुपये प्रतिमाह देने के फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

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