August 5, 2026

12 साल की बच्ची से दरिंदगी मामले में फांसी रद, हाई कोर्ट ने दिया दोबारा ट्रायल का आदेश

0
p_h_court_2-1.jpg

चंडीगढ़
 हाई कोर्ट ने पानीपत के उरलाना कलां में 12 वर्षीय बच्ची के अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के जघन्य मामले में दो दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा रद कर दी। इसके साथ ही केस नए सिरे से ट्रायल के लिए सत्र अदालत भेज दिया है।

जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस रमेश चंदर डिमरी की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल के दौरान ऐसी गंभीर प्रक्रियागत कमियां रह गईं, जिनके कारण दोषसिद्धि को बरकरार रखना संभव नहीं है। अदालत ने साफ किया कि यह आदेश आरोपितों को दोषमुक्त करने के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष और कानून सम्मत सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए दिया जा रहा है।

12 साल की बच्ची के साथ की थी दरिंदगी
आरोप है कि 13 जनवरी 2018 की शाम करीब छह बजे कूड़ा फेंकने निकली 12 वर्षीय लड़की को प्रदीप और सागर उर्फ कल्लू अगवा कर ले गए। प्रदीप के घर में उसके साथ दुष्कर्म किया और बाद में गला दबाकर हत्या कर दी। 18 फरवरी 2022 को ट्रायल कोर्ट ने प्रदीप और सागर उर्फ कल्लू को हत्या, सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम सहित विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

इसके बाद फांसी की पुष्टि के लिए मर्डर रेफरेंस और दोषियों की अपील हाई कोर्ट में लंबित थी। हाई कोर्ट ने पाया, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने स्पष्ट लिखा था कि यौन उत्पीड़न के संबंध में अंतिम राय एफएसएल और रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद दी जाएगी।

'पर्यवक्षण अधिकारियों की घोर लापरवाही'
बाद में एफएसएल रिपोर्ट में पीड़िता के वैजाइनल स्वैब और स्लाइड पर मानव वीर्य मिलने की पुष्टि हुई, लेकिन यह रिपोर्ट डॉक्टरों को भेजकर उनकी अंतिम चिकित्सकीय राय कभी प्राप्त ही नहीं की गई। अदालत ने इसे जांच अधिकारी, थाना प्रभारी और पर्यवेक्षण अधिकारियों की "घोर लापरवाही" करार देते हुए कहा कि हम डॉक्टरों को इस लापरवाही के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते।

यह जिम्मेदारी पूरी तरह जांच अधिकारी, एसएचओ और पर्यवेक्षण अधिकारियों की थी। इतने जघन्य अपराध में यह अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती और न ही इस चूक को नजरअंदाज कर सकती है। यदि केवल प्रक्रियागत त्रुटियों के आधार पर आरोपितों को बरी कर दिया जाए तो पीड़िता और उसके परिवार के साथ गंभीर अन्याय होगा।

ऐसे में सबसे उचित रास्ता यही है कि मामले को उसी चरण से ट्रायल कोर्ट भेजा जाए जहां से चूक हुई थी। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित डॉक्टरों को अदालत के गवाह के रूप में बुलाकर एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर अंतिम चिकित्सकीय राय दर्ज की जाए।

इसके बाद दोनों आरोपितों से सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों पर अलग-अलग प्रश्न पूछे जाएं, उन्हें बचाव साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर दिया जाए और फिर पूर्व निर्णय या हाई कोर्ट की किसी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार नया फैसला सुनाया जाए।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *