पाकिस्तान छोड़ा, सात दिन पैदल चले, मेहनत से पानीपत में बनाई पहचान
पानीपत
पुरुषार्थी हैं… कमाकर खाएंगे। बंटवारे के समय मात्र 12 वर्ष की आयु में पाकिस्तान के मिंटगुंबरी से सब कुछ छोड़कर भारत आए वरिष्ठ आयकर अधिवक्ता कैलाश चंद अनेजा के पिता द्वारा कहे गए ये शब्द आज भी उनके संघर्ष की कहानी बयां करते हैं। विभाजन के दौर में उन्होंने परिवार के साथ जो झोला, वह रोंगटे खड़े करने वाला है, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने न केवल खुद मुकाम हासिल किया, बल्कि दूसरों को भी कामयाव बनाया।
सात दिन की पैदल यात्रा और रास्ते का संघर्ष
स्टेशन से परिवार ने पैदल सफर शुरू किया और सात दिन में फाजिल्का पहुंचे। वे रोजाना करीब 10 मील का सफर तय करते थे। सेना ने इस दौरान काफी मदद की और खाने के लिए आधा किलो गेहूं व आधा किलो चने दिए, जिन्हें उबालकर वे खाते थे।
सफर के दौरान रास्ते में नाले में लाशें पड़ी थीं और कई बार मजबूरी में उसी नाले का पानी भी पीना पड़ा। बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सैन्य जीपों में बैठाकर पहुंचाया गया। रास्ते में एक आरएसएस के स्वयंसेवक ने उनकी मदद की और अपने घर में शरण दी।
पानीपत को बनाया अपनी कर्मभूमि
अनेजा परिवार में वकालत की परंपरा रही है। उनके पिता व चाचा वकील थे। परिवार इसके बाद करनाल आया, मकान बनाया। 15 नवंबर 1965 को जब पानीपत में आयकर विभाग का दफ्तर खुला, तो कैलाश चंद अनेजा यहां आ गए। उन्होंने आयकर के करीब 20 वकीलों को तैयार किया और उन्हें पेशेवर रूप से सफल बनाया।
विभीषिका के उस दौर में सब कुछ गंवाने के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर सफलता की इबारत लिखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद अनेजा आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वर्तमान में वे अपना अधिकांश समय किताबें पढ़ने में व्यतीत करते हैं।
गुरदीता मल ने कहा- 'हम शरणार्थी नहीं, पुरुषार्थी हैं'
परिवार गाड़ी से सहारनपुर होते हुए मुजफ्फरनगर पहुंचा। वहां व्यापारियो द्वारा राहत सामग्री बाटी जा रही थी, जिसे देखकर पिता गुरदीता मल ने दृढ़ता से कहा कि वे शरणार्थी नहीं, बल्कि पुरुषार्थी है और अपनी मेहनत से कमाकर खाएंगे। मुजफ्फरनगर की लाली धर्मशाला में रहकर उन्होंने शुरुआत की। दिल्ली से लाकर चार आने में मोती और कानों की बूंदी बेवी, बादाम और दूध का व्यापार किया और फिर कपड़े के व्यवसाय में उतरे। इस दौरान उन्होंने पंजाबियों की एक कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी भी बनाई।
96 वर्षीय कैलाश चंद अनेजा बताते हैं कि विभाजन से पहले पाकिस्तान के मिटगुंबरी में माहौल सामान्य था। हिंदू और मुस्लिम मिलजुलकर रहते थे, लेकिन जैसे ही देश के बंटवारे की बात आई, फिजां बदल गई।
एक दिन कुछ लोग हथियारों और डंडों के साथ उनकी बड़ी हवेली पर आए। उस हवेली में उनके पिता गुरदीतामल अनेजा और उनके चारों भाई संयुक्त रूप से रहते थे।
हमलावरों ने धमकी दी कि कल तक हवेली खाली कर दो। बिगड़ते हालात को देखते हुए परिवार को घर-बार छोड़ना पड़ा। वे स्टेशन पहुंचे जहां भारी भीड़ थी। पैर रखने तक की जगह नहीं थी।
पाकिस्तान में थी बड़ी हवेली और 200 एकड़ जमीन
96 वर्षीय कैलाश चंद अनेजा बताते हैं कि विभाजन से पहले पाकिस्तान के मिंटगुंबरी में माहौल सामान्य था। हिंदू और मुस्लिम मिलजुलकर रहते थे, लेकिन जैसे ही देश के बंटवारे की बात आई, फिजां बदल गई। एक दिन कुछ लोग हथियारों
और डंडों के साथ उनकी बड़ी हवेली पर आए।
उस हवेली में उनके पिता गुरदीतामल अनेजा और उनके चारों भाई संयुक्त रूप से रहते थे। हमलावरों ने धमकी दी कि कल तक हवेली खाली कर दो। बिगड़ते हालात को देखते हुए परिवार को घर-बार छोड़ना पड़ा। वे स्टेशन पहुंचे जहां भारी भीड़ थी। पैर रखने तक की जगह नहीं थी।
