दो दशक बाद झारखंड में माओवादी संगठनों की कमर टूटी, जंगलों में लौटी शांति
रांची
शासन से असंतुष्ट होकर सत्ता के विरुद्ध उठाए गए हथियार को झुकाने में सुरक्षा बलों को दो दशक का लंबा अंतराल लगा। छह सौ से अधिक जवानों-अधिकारियों का बलिदान देना पड़ा। केंद्र व राज्य की सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निरंतर अभियान चलाया। प्रलोभन दिया, राज्य सरकार की आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति जैसा प्लेटफार्म दिया।
जंगल-जंगल खाक छानी, मारक कार्रवाई की, गोला-बारूद के आपूर्ति रूट को ध्वस्त किया, राशन की सप्लाई चेन तोड़ी, सुदूर गांवों तक ग्रामीणों का विश्वास जीता, उन तक विकास की उम्मीद पहुंचाने की पहल की, तब जाकर यह सफलता मिली।
इन दो दशकों में झारखंड से एक-एक कर दर्जनभर माओवादी संगठनों के वजूद मिटते चले गए। अब स्थिति यह है कि सभी बड़े माओवादी, उग्रवादी या तो मारे गए या मुख्य धारा में लौटकर खेती-बारी करने लगे या फिर गिरफ्तार-आत्मसमर्पण के बाद जेल में सुख-चैन की जिंदगी जी रहे हैं। न भागदौड़ की जिंदगी, न मारे जाने का भय है।
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) से शुरू हुआ माओवादियों का सफर अब थम गया है। इस संगठन से टूट-टूटकर करीब दर्जनभर कुख्यात संगठन तक बने, लेकिन सुरक्षा बलों की दृढ़ इच्छा शक्ति व साहस ने एक-एक कर सभी संगठनों को धूल चटा दी है।
जिस रास्ते से लोग दिन में गुजरने से भय खाते थे, सुरक्षा में तैनात पदाधिकारी व जवान मुंह पर गमछा बांधकर उस इलाके में चलते थे, वहां अब रात में भी लोग बेखौफ होकर चल रहे हैं।
जंगल में भी गोले-बारूद की गूंज थम चुकी है। मोबाइल के टावर उड़ाने वाले, पुल-पुलिया ध्वस्त करने वाले, सुरक्षा बलों पर हमला करने वाले माओवादी, उग्रवादी अब नहीं के बराबर हैं, यूं कहें तो मृत प्राय हो चुके हैं।
करोड़ो की लेवी से कारोबारी थे परेशान, मिली मुक्ति
झारखंड में दो दशक से विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने नहीं दे रहे थे माओवादी। बड़े-बड़े कारोबारी झारखंड में कारोबार से हिचकते थे, इसकी मूल वजह थी माओवादियों तक करोड़ों की लेवी पहुंचाना। पूरा झारखंड दहशत में था।
कोयला का कारोबार हो, सड़क, पुल-पुलिया का निर्माण हो, सड़क बनना हो या फिर स्कूल, अस्पताल बनना हो, ईंट, गिट्टी, बालू का परिवहन हो, माओवादियों को लेवी दिए बगैर कोई काम नहीं होता था।
केंद्र व राज्य ने मिलकर पहले आपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया। आपरेशन ग्रीन हंट से आपरेशन क्लीन व आपरेशन नव जीवन तक ने माओवादियों, उग्रवादियों की कमर तोड़ डाली। इसका नतीजा यह हुआ कि झारखंड के जंगलों में शांति लौट आई।
लंबे समय तक मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं चार प्रमुख संगठन
माओवादियों के चार प्रमुख संगठन ही मुख्य रूप से सक्रिय रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा माओवादी संगठन भाकपा माओवादी हैं। इसके अलावा दूसरे स्थान पर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया (पीएलएफआई), तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) व झारखंड जन मुक्ति परिषद है। इन चारों ही माओवादी संगठनों के सभी बड़े नेता, बड़े उग्रवादी मारे, पकड़े जा चुके हैं। कइयों ने आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा से जुड़ना स्वीकार किया है।
ये हैं दो दशक में झारखंड में सक्रिय रहे प्रमुख माओवादी संगठन
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) : यह देश में माओवादियों का सबसे पुराना संगठन है। इसी संगठन के बाद बंगाल के नक्सलबाड़ी में शासन के विरुद्ध युद्ध छिड़ा और इससे प्रेरित होकर नक्सलबाड़ी से हथियार के साथ युवाओं ने हथियार उठाया, जिन्हें नक्सली कहा गया।
भाकपा माओवादी (सीपीआइ, माओवादी) : पीएलजीए के बाद देश में भाकपा माओवादियों की नींव पड़ी। इनके नेता झारखंड, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बंगाल आदि राज्यों में सक्रिय हुए। युवाओं को माओवाद से जोड़ा और देखते ही देखते यह देश का सबसे बड़ा माओवादी संगठन बन गया, जो सत्ता के विरुद्ध हथियार के बल पर शासन का विरोध करता था।
तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) : भाकपा माओवादियों के ही कुछ सदस्य टूटकर अपना नया संगठन बनाए। ये खुद को माओवादियों के समानांतर अपना संगठन संचालित करने लगे। ये सर्वाधिक कोयला क्षेत्र में ही सक्रिय रहे। चतरा, लातेहार, पलामू, हजारीबाग, रांची आदि जिलों में इस संगठन ने लंबे समय तक अपना वर्चस्व कायम की थी।
झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) : यह माओवादियों के विरुद्ध खड़ा किया गया संगठन था। बाद में यह संगठन भी माओवादी विचाराधारा के अनुरूप चलने लगा और देखते ही देखते नासूर बन गया। इसको लेकर कई बार सुरक्षा बलों की गतिविधियां भी कटघरे में खड़ी हुई थी, क्योंकि इस संगठन के नेता पहले सुरक्षा बलों के साथ माओवादियों के विरुद्ध अभियान में शामिल होते थे। इस संगठन का भी झारखंड से सुपड़ा साफ हो गया।
सम्राट गिरोह : रांची-खूंटी सीमा पर लकड़ी की तस्करी सहित अन्य गतिविधियों में यह संगठन सक्रिय था। इस संगठन ने अपने साथ कई युवाओं को जोड़ा। बाद में यह संगठन भी माओवाद की तर्ज पर खुद को स्थापित करने का प्रयास किया। दहशत भी कायम किया, लेकिन यह दहशत लंबे समय तक रह नहीं सका।
झारखंड लिबरेशन टाइगर्स (जेएलटी) : रांची, खूंटी क्षेत्र में कुख्यात जयनाथ साहू के सम्राट गिरोह से खुद को अलग कर दिनेश गोप ने झारखंड लिबरेशन टाइगर्स नामक संगठन बनाया। बाद में इस संगठन को जब प्रतिबंधित किया गया तो दिनेश गोप ने पीएलएफआइ नाम से संगठन बनाया।
पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया (पीएलएफआई) : जेएलटी प्रतिबंधित होने के बाद पीएलएफआई नाम से संगठन बनाकर दिनेश गोप लंबे समय तक माओवादी गतिविधियां संचालित करता रहा। टेरर फंडिंग मुख्य काम रहा। अब यह संगठन भी समाप्त हो चुका है।
ये संगठन भी कुछ समय के लिए रहे सक्रिय
झारखंड में कुछ समय के लिए झारखंड प्रस्तुति कमेटी (जेपीसी), सशस्त्र पीपुल्स मोर्चा (एसपीएम), संघर्ष जन मुक्ति मोर्चा (एसजेएमएम), झांगुर ग्रुप, पहाड़ी चिता, शांति सेना नाम से संगठन सक्रिय रहे।
इनके माओवादी, स्पिलिंटर ग्रुप कारोबारियों के लिए परेशानी का सबब बने रहे। बाद में इन संगठनों का भी खात्मा हो गया। कई संगठनों के सदस्यों ने आपराधिक गिरोह से खुद को जोड़ लिया।
