September 22, 2026

पटना की 108 साल पुरानी जलमीनार का होगा कायाकल्प, ₹3.38 करोड़ से बनेगा हेरिटेज गार्डन

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पटना
 वीरचंद पटेल पथ पर मिलर हाईस्कूल के पास खड़ी ऐतिहासिक जलमीनार पटना की उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे है, जब शहर में पानी पहुंचाने के लिए स्टीम इंजन का सहारा लिया जाता था।

वर्ष 1915 से 1918 के बीच बनी करीब 130 फीट ऊंची यह जलमीनार अब फिर चर्चा में है। नगर निगम इसे उसके मूल स्वरूप को बचाते हुए जीर्णोद्धार कर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित करने की तैयारी में है।

108 वर्ष पुरानी इस जलमीनार के जीर्णोद्धार और परिसर के सुंदरीकरण पर 3.38 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। परिसर में करीब 2,500 वर्गफीट क्षेत्र में आधुनिक कैफेटेरिया भी बनाया जाएगा।

ऐति‍हासिक धरोहर के रूप में होगी विकसित
इसमें बैठने की जगह, रसोई, काउंटर और अन्य जरूरी सुविधाएं होंगी। इससे विद्यार्थियों, लोगों और यहां आने वाले पर्यटकों को सुविधा मिलेगी। काम पूरा करने के लिए छह महीने की अवधि तय की गई है।

यह जलमीनार पटना की पुरानी जलापूर्ति व्यवस्था की गवाह है। वर्ष 1915 से 1918 के बीच बनी इस मीनार में करीब एक लाख गैलन पानी संग्रहित किया जा सकता था

खास बात यह है कि उस समय पानी को ऊपर चढ़ाने के लिए आधुनिक मोटर नहीं, बल्कि स्टीम इंजन का इस्तेमाल होता था। एएन कालेज के पास स्थित कुएं से स्टीम इंजन के जरिये पानी इस जलमीनार तक पहुंचाया जाता था।

जैसे ही जलमीनार पूरी भर जाती थी, यहां से लाल सिग्नल दिखाया जाता था। यह संकेत एएन कालेज के पास लगे स्टीम इंजन तक पहुंचता था और इंजन बंद कर दिया जाता था।

जलमीनार की यह व्यवस्था उस समय की तकनीकी समझ और इंजीनियरिंग का उदाहरण थी। फ्लोटिंग इंडिकेटर तकनीक से पानी का स्तर बढ़ने के साथ इंडिकेटर की स्थिति बदलती थी और जलमीनार के भरने का संकेत मिलता था।

उस समय इससे जुड़ा जलापूर्ति नेटवर्क 200 से 250 किलोमीटर तक फैला हुआ था। पहले यह व्यवस्था बांकीपुर वाटर सप्लाई हेड वर्क्स के अंतर्गत थी।

1978 तक इस जलमीनार से होती थी जलापूर्ति
इसके जरिये वर्तमान के नूतन राजधानी, पाटलिपुत्र और बांकीपुर अंचल के विभिन्न क्षेत्रों में पानी पहुंचाया जाता था। यानी आज जिन इलाकों में शहर का बड़ा हिस्सा बसा हुआ है, वहां दशकों पहले इसी व्यवस्था के जरिये घरों तक पानी पहुंचता था।

सितंबर 1978 तक इससे जलापूर्ति होती रही। इसके बाद यह ऐतिहासिक ढांचा उपयोग से बाहर हो गया। लाल ईंटों से बनी इस जलमीनार की स्थापत्य शैली भी इसे खास बनाती है।

गुंबददार संरचना वाली यह इमारत करीब एक सदी से अधिक समय से शहर के बदलते स्वरूप की गवाह रही है। जलमीनार के साथ पूरे परिसर का भी विकास किया जाएगा।

करीब 14,400 वर्गफीट क्षेत्र में समग्र विकास की योजना है। सजावटी रोशनी से जलमीनार को आकर्षक रूप दिया जाएगा। जलीमनार परिसर में पहले दो जलापूर्ति केंद्र थे।

एक जलापूर्ति केंद्र समेत करीब 60 प्रतिशत जमीन एमएलसी आवास के लिए चली गई। बचे जलापूर्ति केंद्र की क्षमता 120 अश्वशक्ति है, जो अभी चालू है। वर्तमान में परिसर तक पहुंचने में अवैध पार्किंग बड़ी समस्या है।

जलमीनार की नींव सुरक्षित, पारंपरिक तकनीक से होगा जीर्णोद्धार
जलमीनार की स्थिति का आकलन एनआइटी पटना के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जलमीनार में समग्र झुकाव, नींव में दरार या मिट्टी के अलग होने के संकेत नहीं मिले।

हालांकि, कुछ स्थानों पर नमी, लिंटल में दरार और सीढ़ियों की खराब स्थिति जैसी समस्याएं मिली हैं। इनके सुधार को जीर्णोद्धार योजना में शामिल किया गया है।

मूल निर्माण सामग्री के अनुकूल चूने आधारित और सांस लेने योग्य पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। अनावश्यक बदलाव से बचते हुए मौजूदा संरचना को सुरक्षित रखने की योजना है।

प्रस्ताव में जलमीनार की वास्तुकला को उभारने के लिए वार्म एलईडी लाइट लगाने की भी योजना है। इससे रात में भी इसकी पहचान बनी रहेगी।

हेरिटेज गार्डन के मध्य होगी ऐतिहासिक जलमीनार
योजना के तहत 10,880 वर्गफीट में हेरिटेज गार्डन विकसित किया जाएगा। इसके मध्य ऐतिहासिक जलमीनार रहेगी। चारों ओर पौधों की क्यारियां और हरियाली विकसित होगी।

मुख्य प्रवेश द्वार से जलमीनार तक पैदल पथ बनाया जाएगा। दोनों ओर छायादार पेड़ लगाए जाएंगे। चारदीवारी पर प्राकृतिक पत्थर की क्लैडिंग और सजावटी लोहे की रेलिंग होगी।

प्रवेश द्वार पर कलात्मक लोहे का गेट और खंभों पर सजावटी लाइटें लगाई जाएंगी। परिसर में वर्षा जल संचयन की भी व्यवस्था होगी।

    14,400 वर्गफीट क्षेत्र का होगा विकास
    2,500 वर्गफीट में बनेगा कैफेटेरिया
    4,325 वर्गफीट में परिसर विकसित होगा
    1,963.50 वर्गफीट क्षेत्र में है जलमीनार
    5,600 वर्गफीट में बिछेगा पेवर ब्लाॅक

 

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