आदिवासी समाज 9 नवंबर को मनाएगा सोहराई पर्व, गाय-बैल समेत पशुधन की होगी विशेष पूजा
रांची
आदिवासी समाज में दिवाली के अवसर पर सोहराई पर्व मनाने की विशेष परंपरा है। इस वर्ष यह पर्व 9 नवंबर को मनाया जाएगा। सोहराई को पशुधन और अन्न धन की पूजा का पर्व माना जाता है। आदिवासी समाज में गाय, बैल और बकरी का जीवनयापन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
इसी कारण इस पर्व में पशुओं की पूजा कर उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट की जाती है।जगलाल पाहन के अनुसार, सोहराई कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। पर्व के दिन सुबह पशुओं को घरों से बाहर निकालकर नहलाया जाता है।
इसके साथ ही हल, फावड़ा और खेती में इस्तेमाल होने वाले अन्य उपकरणों की भी सफाई कर पूजा की जाती है। इसके बाद गोहाल घर यानी पशुओं के रहने के स्थान की विशेष पूजा होती है। महुआ की डाली से खूंटा बनाकर गोहाल घर के कोने में गाड़ा जाता है और पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की जाती है। पशुओं को बांधने वाली जगह पर अक्षत और टीका लगाया जाता है। चावल के घोल से रंगोली जैसी कलाकृतियां भी बनाई जाती हैं
इस दिन पशुओं के सींगों पर तेल लगाया जाता है और उन्हें फूलों से सजाया जाता है। चावल के घोल से उनके शरीर पर भी पारंपरिक आकृतियां बनाई जाती हैं। शाम को पटाखे और आवाजें निकालकर पशुओं को दौड़ाया जाता है।
जगलाल पाहन के मुताबिक, इसके पीछे मान्यता है कि मनुष्यों के साथ रहने वाले पशु अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति और संकट के समय भागने की क्षमता न भूलें। शाम को गोहाल घर में पशुओं को बांधने से पहले उन्हें उड़द, घघरा और प्रसाद स्वरूप पारंपरिक हड़िया दिया जाता है। पशुओं के बर्तन से उनके मालिक भी खाते हैं। पूजा में चढ़ाए गए मुर्गे से पारंपरिक व्यंजन सूढ़ी तैयार कर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
जगलाल पाहन बताते हैं कि सोहराई पशुधन के महत्व को स्वीकार करने का पर्व है। पहले आदिवासी समाज की आजीविका मुख्य रूप से पशुओं पर निर्भर थी। संकट के समय गाय, बैल और बकरी बेचकर परिवार अपनी जरूरतें पूरी करते थे।
इस दिन पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति को सम्मानस्वरूप मानदेय भी दिया जाता है। इस तरह सोहराई प्रकृति, कृषि, पशुधन और सामुदायिक परंपराओं से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
