June 25, 2026

फर्जी दस्तावेज पर 22 लोगों ने 32 साल तक की रेलवे की नौकरी, खुलासा करने में लग गए 21 साल

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 नई दिल्ली 

रेलवे में फर्जी दस्तावेज पर 22 कर्मचारियों के 29 से 32 साल तक नौकरी करने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। हैरत की बात यह है कि रेलवे को इसकी जानकारी नौ साल बाद लगी। इसके बाद जांच पूरी करने में विभाग को 21 साल लग गए। इस दौरान फर्जी दस्तावेज पर नौकरी कर रहे लोग रेलवे से वेतन और भत्ता भी लेते रहे। रेलवे को इस मद में 10 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। कैग की रिपोर्ट से मामला सामने आया। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ओर से संसद के शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट पेश की गई थी। इसमें कहा गया है कि कैग के जुलाई 2020 को मध्य रेलवे के विद्युत विभाग के कार्मिक अभिलेखों की जांच से पता चला कि मई 1989 से अप्रैल 1992 के बीच खलासी, मिस्त्री, मोटर वैन ड्राइवर के रूप में 22 कर्मचारियों ने निर्माण संगठन (महानगरी परिवहन परियोजना-रेलवे) में नौकरी हासिल की थी। उनके द्वारा जमा किए गए दस्तावेज फर्जी हैं, इसका पता मध्य रेलवे को नौ साल बाद (1998, 2001 और 2004) चला। इस आधार पर रेलवे ने सितंबर 2001 से अक्तूबर 2004 के बीच कर्मचारियों को आरोपपत्र जारी किया।

तीन को रिटायरमेंट से चार से पांच दिन पहले हटाया
कुल 22 फर्जी कर्मचारियों में से 18 को अक्तूबर 2021 में नौकरी से हटाया गया। तीन कर्मियों को सेवा से तब हटाया गया, जब उनकी सेवानिवृत्ति के चार से पांच दिन बचे हुए थे। इन सभी को वेतन-भत्ते मद में रेलवे ने 10.37 करोड़ रुपये जारी किए।

रेलवे बोर्ड की नसीहत भी काम नहीं आई
रेलवे की सतर्कता का यह आलम तब है, जब रेलवे बोर्ड ने जुलाई 1993 में सभी जोनल रेलवे को पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया कि नौकरी पाने के लिए फर्जी दस्तावेज लगाने वालों को तुरंत सेवा से बर्खास्त कर दिया जाए।

जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश
कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि मध्य रेलवे फर्जी दस्तावेजों की समय पर जांच करने में विफल रहा। कैग इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने की सिफारिश करती है। इससे पूर्व कैग ने अप्रैल 2022 में फर्जी दस्तावेजों की मदद से 22 लोगों के रेलवे में नौकरी पाने और समय पर जांच पूरी नहीं करने के बारे में रेलवे बोर्ड के सामने रखा था। इस पर बोर्ड ने जुलाई 2022 को अपने जवाब में कहा कि उस वक्त प्रचलित प्रक्रिया में तुरंत जांच की जरूरत नहीं थी, इसलिए विलंब हुआ। साथ ही जांच अधिकारियों की प्रोन्नति और उक्त दोषी कर्मियों को पूछताछ के लिए कार्यमुक्त नहीं किया गया इससे जांच में देरी हुई। हालांकि, कैग ने रेलवे बोर्ड के उत्तर से असहमति जताई।
 

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